Monday, May 9, 2016

My dear Friend and soul sister Jhankar's wonderful poems


तुम कितना करते हो मेरे लिये..
और कितनी सादगी से.. 
उस दिन उठा लाये.. पूरा आसमान..
और दे दिया मुझे.. कुछ इस तरह..
जैसे दिया हो कोई रूमाल.. 
अब हूँ परेशान.. कि कैसे रक्खू.. 
सम्भाल के.. कहाँ..
कैसे तहाऊँ ..
गिर गिर जाते है तारे.. और मुड़ जाता है चाँद ..
परसों खाते खाते उठे.. और कहा..
रूको तुम्हारे लिये कुछ लाया हूँ..
और थमा दिया .. पूरा इन्द्रधनुष..
कुछ रंग वही फ़र्श पर गिर गये..
कुछ उगली पे चिपके है..
बाक़ी सम्भाल के रख दिये... 
कि कही fade ना हो जाये..
क्यों दे देते हो.. मुझ ग़रीब को इतना..
बहुत छोटे हाथ है मेरे.. 
देखो ना.. बस दो ही लकीरें है.. इसमें ..
एक तुम्हारी.. और एक मेरी.. 
अच्छा देना ही है .. तो 
कुछ छोटा सा दे दो..
एक लिफ़ाफ़े मे डाल के.. मुझे ले लो..
हाँ मुझे बस इत्ता दे दो..  

कि मुझे पूरा ले लो..

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When Aradhana complained, that Jhankar did not write on the girls..

अराधना.. मत जाओ आज morning walk पे.. 
बैठो ना यही.. चरस की खेती करते है..
ख़ूब .. ख़ूब .. जंगल के जंगल ..खलिआन के खलियान.. 
दूर जा कर बेचे उसे..अमेरिका देश मे..
वहाँ के लोगो को बहुत चस्का है इसका.. 
डालर कमाये.. 
उससे और चरस के पौधे ख़रीदे ..छोटे छोटे..
हर शहर.. हर गाँव .. हर whatsapp group मे बो दे..
क्योंकि जब चरस के फूल खिलते है.. तो सब तरफ़ उसकी भीनी भीनी ख़ुशबू उड़ती है.. 
पूरा दिन महकता है.. 
ख़ुशबू आफिस के अन्दर भी ठीठ जैसी घुस आती है.. 
जया के चौके मे पसर जाती है..
कितनों के लिहाफ़ के अन्दर झांकती है.. May i....✋🏼
विमल उसे इडली के साथ खाती है..
हाँ इस ख़ुशबू से किसी किसी को छींक भी आती है.. allergy है..
कोई कोई अपनी खिड़की दरवाज़े एकदम कसके बंद करके रखता है.. सिटकनी लगा के.. कि कही ये यहाँ ना आ जाये.. यहाँ ये निषेध है..
पर ठीक है.. जो है सो है.. 
कभी उन्हें भी चटा देंगे .. इमान धरम बिगाड़ देंगे उनका भी..
तो तय रहा की.. ठंडक बहुत है.. कौन कम्बख़्त morning walk पे जाये..
आओ यही जलाये.. चरस का चूल्हा..सिगड़ी पे..
और तापे.. सब लोग मिल कर.. !!
हाथ मे लिये सुबह की पहली चाय का कप ...करे रात के आख़िरी जाम के साथ cheers ..

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For Vyom, on his Birthday

वो कोई बहुत ख़ूबसूरत सा दिन होगा..

जब भगवान ने व्योम को बनाया होगा.. 
..  कहा होगा.. बनाता हूँ.. आराम से.. 
पहले दूर तक टहल के आता हूँ..
..  हरी ठंडी घास पे नंगे पैर देर तक..
.. रास्ते मे कई फूल चुने होगें.. अलग अलग रंग के.. 
उनकी ख़ुशबूओ के बारे मे सोचा होगा ..
..  अपने किसी राजू को कहा होगा.. पहले अच्छी सी चाय पिलाओ.. फिर बनाता हूँ.. व्योम को.. 
अपने किसी दोस्त को बुला लिया होगा.. आजा .. गुलाबी ठंडक है.. और मेरा मूड बहुत बढिया है.. 
कुछ अच्छा.. अलग सा काम करते है.. .
और बस बड़ी मुहोब्बत से कुछ बनाया
होगा..    व्योम को.. 
एकदम फ़ुर्सत मे.. 
और फिर आराम किया होगा.. आराम से.. अगले दिन तक ..  ख़ूब देर तक नींद पूरी कर के.. और कहा होगा.. आज कोई काम नही करूँगा .. आज मेरी छुट्टी....

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Poem on meeting friends at #GCAlumni 2018

सुरूर है.. नशा है.. 

पहली बार पी गयी दारू का..
जो बह रही अब तक धमनियों मे..
एक मुकम्मल सा अहसास..
जैसे उतरी हो नथ.. अभी पहली बार..
सूकून है.. चैन है..
कुछ कमीने यार थे.. बरसो के बाद साथ थे.. 
... ज़ोर से बोला गया .. अपनी आवाज मे सुना ..बहनचोत.!!
और फिर प्रिती के चेहरे की कुछ बदलती लकीरें ..
सब.. फ़्रीज़ है..  ठहरा .. 
ज़हन मे धरी है .. ज्यों की त्यों ... 
कह रही है.. सब ठीक है.. सब सुन्दर है..
अगर.. आस पास है ये कुछ लोग.. 
जो मेरे ख़त्म होते बचपन .. और जवानी के पहले पड़ाव मे..
चले साथ साथ थे..
यूँ तो बिछडते पे सब अलग थलग से थे..
ना ठीक से किया गया बॉय बॉय.. बरसो ना किया गया दुआ सलाम था..
..फिर आज यूँ मिले.. जैसे कुंभ के बिछड़े भाई हो..
देख मेरे हाथ पे गुदा है.. वो तेरे हाथ वाला निशां..
और बस यूँ मिले छलक के गले..
कि अब तक लिये घूम रहा हूँ.. तेरे से गले मिलने का अहसास.. ..
ए कॉलेज ..और उसी की शक्ल से मिलते जुलते कुछ.. मेरे जिगरी यार...
मुझे तो गुमां भी ना था.. कि रक्खा है सम्भाल के..मेरे दिल ने.. 
गोमती के पानी मे भीगा हुआ.. तेरा वो पुराना रूमाल.. 
सिगरेट पीते.. आवारा से थे जो लड़के ..
झुंड मे फिरा करते थे.. 
शैक के आस पास दिखा करते थे..
बेवजह खीखी.. तानो ..फब्तियो मे बात किया करते थे.. 
पीठ पे चुभती थी उनकी वो हँसीया..फब्तिया..जुमले.. तंज.. कहकहे.. 
२५ साल यूँ बीते.. कि वो कमीने भी सब अपने हो गये.. 
अबकी मिले.. तो सब बेटियों के बाप दिखे.. .. 
सह्दय .. कोमल.. vulnerable..compassionate..
जिनके सामने रोया जा सकता है..
बात की.. तो सब अपने जैसे निकले.. 
अरे इनके भी तो वही दो आँखें .. एक नाक.. दो कान है.. 
ये भी तो कितने हैरान परेशान है.. ..
नही.. नही.. ये कोई डरने की चीज़ नही.. 
इनको छू सकते है.. बात कर सकते है..ये काटते भी नही.. 
वो जो सब ..हठ्ठी डेढ़ हठ्ठी के हुआ करते थे.. सब भर गये... 
किसी के पक.. तो किसी के झड़ गये..
चेहरे पे नई लकीरें .. आ गयी.. 
बच्चे कच्चे .. गाड़ी बंगला आफिस हो गया.. तो सबकी तबियत मे फ़क़ीरी आ गयी..  .. 
lift lobby मे गायी गयी.. बेगम अख़्तर की कुछ ग़ज़ले .. दादरे ..
हॉय..  
मेरी क़लम.. मेरी पेन्सिल लाचार है..
सब उतारने को.. पन्नों पे..
मेरे दिल की जो capacity है..memory की..
16.. 32.. ... 64 GB की.. 
वो बेबस हो गयी है.. फट रही है..
इत्ता भर गया है.. कि कुछ delete करना पड़ेगा .. 
पर साला क्या.. 
यहाँ घर का सारा काम पड़ा है.. और मन को देखो वही कॉलेज मे अटका है..
चल भई.. अब हुयी सुबह.. लौट आया जाये ..
और भी ग़म है.. यादबाजी के सिवा.. कुछ काम निपटा लिया जाये..
मोक्ष का है bio का पेपर.. कुहु का भी कोई जटिल पर्चा..
ठेर से कपड़े धुलने को है.. ख़ाली हुयी अटैचीया.. उपर चढ़ने को है..
क्या नाश्ता.. क्या खाना बनाना है..
२ दिन बाद फिर किसी शादी मे बाहर जाना है.. 
क्या पहनना.. क्या देना लेना सोचने को है..
दो दिन .. बहनों .. कजिन्स.. मौसियो.. से मिल कर आऊँगी ..
और फिर कुछ यादें .. बटोर लाऊँगी ..
और वही आदतन.. उसमें खो जाऊँगी ..
दिल बड़ा कच्चा है मेरा.. 
जुड़ जाये कह .. तो वही फिरता है.. 
कोई इसका software update हो तो बताओ..
हमको तो लगता है.. ये obsolete हो गया है..
इसके मरम्मत के पुर्ज़े नही मिलेंगे .. 
ख़त्म तो नही हो पा रही है .. ये कविता .. या जो कुछ भी है.. 
पर अब हम इसे यही कर देते है.. 
क्योंकि हमें चाय पीनी है.. सुबह की पहली.. 
फिर हम एक छपकी मारेंगे .. थोड़ा सोयेंगे .. थोड़ा सुस्तायेंगे .. 
और बस बहुत हो गया.. 
अपने कॉलेज से .. घर लौट आयेंगे ..


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खुदा.. अपनी रहमत कर..
जो थोड़ी बहुत अक़्ल फ़रमायी है.. उसे वापस ले ले.. 
बदले मे कुछ क़तरे मुहोब्बत के डाल दे...
ये अक़्ल बहुत आड़े आती है.. मुहोब्बत करने के..
ये ऐसे नहीं .. इस वक़्त नहीं .. इस ठंग से नहीं .. सौ पहरे लगाती है... बेमतलब के शऊर समझाती है.. 
ये अक़्ल बहुत बड़े बाप की बेटी है.. हमेशा अपनी चलाती है..
मुहोब्बत बेचारी जैसी ग़रीब की बेटी.. मन मार ले जाती है.. 
पर बीतती उम्र से देखा है .. जो कहते है ना लोग .. ज़िन्दगी चार दिन की है..


वो शायद मुहोब्बत से बिताये दिन ही गिनते है..

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तुम कहते हो चाय जिसे..
वो मुहोब्बत है मेरी..
अरे कितनी बातें उसने अपने कप के अन्दर रक्खी..
दोस्तों और मेरी..
मेरी तेरहवीं पे पन्डितो को चाय पिला देना..
और पोहा खिला देना...
कोई अच्छा सा गाना लगा देना...
बस हमारी आत्मा वात्मा त्रप्त हो जायेगी.. ..
और सुनो .. हमसे थोड़ा कम मिला करो.. वरना से बीमारी तुम्हें भी हो जायेगी..

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चल चाँद पे चलते है..
लोटा भर चाय लेकर..
बहुत बातें करेंगे .. सारी निपटा लेंगे ..
दो चार ठो को और बुला लेंगे ..
गिटार ले जायेंगे .. गाना वाना गायेंगे ..
फ्राईडे नाइट की फ़्लाइट  से जायेंगे ..
सनडे नाइट तक आ जायेंगे ..
मनडे सुबह फिर साला आफिस निकल जायेंगे ...

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हाँ कुछ पुरानी सी तो हूँ...
किताबी बातें करती हूँ.. किताबों की बातें करती हूँ.. किताबों से बातें करती हूँ..
हाँ कुछ पुरानी सी तो हूँ..
ख़तो की ..चिट्ठियों की बातें करती हूँ..
चाय की .. रूहआवजा की .. बातें करती हूँ
चाँद की बातें करती हूँ..
हाँ कुछ पुरानी सी तो हूँ..
नये फ़ोनों से घबराती हूँ..
कोई कुछ नया लैपटॉप पर समझाये तो डर जाती हूँ..
नये गाने याद ही नहीं कर पाती हूँ..
पुरानी धुरानी ग़ज़ले गुनगुनाती हूँ..
हाँ कुछ पुरानी सी तो हूँ...
किसी को दीदी सा ..किसी को दादी सा .. समझाती हूँ..
प्यार मे बहुत ताक़त है.. पे अड़ जाती हूँ..
रिश्तों से बढ़ कर कुछ नहीं है .. पढ़ाती हूँ..
क्षमादान महादान ..ऐसी बातें दुहराती हूँ..
हाँ कुछ पुरानी सी तो हूँ...
नाश्ता तो सिर्फ़ पराँठा होता है.. इसके आगे जान नहीं पाती हूँ..
रात का खाना क्या बनाऊँ .. परेशान हो जाती हूँ..
ठेर सारे लोग घर पे आ जाये तो
सब ठीक है.. सब सही है..
जो चाहिये.. यही कही है..
रोज़ सुबह पता नहीं कहाँ से ठेर सारा प्यार दिल मे भर जाता है..
दिन भर जिन जिन से मिलू.. उन सबके लिये..
बाँटती हूँ.. पाती हूँ.. मिलती हूँ ..बतियाती हूँ..
जी खोल के इतराती हूँ..
हाँ पर कुछ पुरानी सी तो हूँ..

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कोई पीछे का दरवाज़ा खुला रह गया..
बुढ़ापा धीरे से आ गया...
पहले छिप के बैठा ..
बालों की जड़ो मे. ..
कमर की बलों मे..
आँखों के नीचे डार्क सर्कलस मे..
चेहरे की लकीरों मे...
आजकल बड़ा दिलेर हो गया है..
बिन्दास कही भी धड़धड़ा के चला आता है...
हर जगह धावा बोल रक्खा है..
साला छुपा ही नहीं सकते..
मैक के महँगे मेकप के नीचे..
नहीं .. हर दिवार तोड़ कर सामने आ जाता है..
अपनी आवाज़ मे पापा के जुमले सुनायी पड़ते है..
इसकी और डर की भी बड़ी दोस्ती है..
आपस मे साठँ गाँठ करके उसको भी बुला लिया है..
वो भी हर जगह दख़लंदाज़ी करने लग गया है..  हर बात मे..
बात ख़र्चे की हो या बचाने की.. कोई रिश्तेदारी निभाने की..
बच्चों को समझाने की ..  या नई योजना बनाने की..
ये कान मे आ कर फुसफुसा के कुछ कह जाता है.,
पापा टाइप के अलफाजो मे....
मीठा ख़ुद कम किया.. कुछ इन सब की सोहबत ने..
अपनी ही ज़ुबान की तलखियत समझ नहीं आती ..
चाँद मे .. तारो मे... बसो मे.. कारो मे...
टैर्फिक की क़तारों मे....
शहर मे ..फ़िल्मों मे.. राजनिती की गलियों मे..
बस कमियाँ दिख जाती है.....
तलाश है किसी खिड़की की....
कि कोई ताज़ा हवा का झोंका आ जाये....
बचपन मे बड़ी मीठी मीठी नानीया मिल जाती थी...
कोई बहुत बुढे से अंकल बड़ी तसल्ली से बात समझाते थे...
तो अगर वो आ ही गया है...  तो दोस्ती ही कर लेते है...
सलाह मशवरा करते है.. देखते है.. कहाँ फ़ायदा लिया जा सकता है इसका..
हाँ.. अलबत्ता डर को सामने का रास्ता दिखाया जा सकता है..
कि तुम चलते बनो...
और मुहोब्बत को भेज देना... रसगुल्ले लेकर...,

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तेरी कविता .. मेरी कविता से बात करती है..

कल दोनों बहुत देर रात तक मेरे सिरहाने बतिया रही थी...
मैं तो सो रही थी.. उनकी कुछ कुछ बातें मेरे कानो मे आ रही थी...

एक बोली मैं बस बहते बहते जाना चाहती हूँ..
दूसरी हँसी और बोली.. मैं उन दूर आसमानों मे उड़ना चाहती हूँ..

एक दिन एक बोली .. चल झील किनारे ग़ज़ल गुनगुनायेंगे ..
दूसरी बोली नहीं !  जाड़े की धूप है.. छत पे पतंग उड़ायेंगे ...

कभी हँसते कभी झगड़ते .. एक दूसरे की उँगलियाँ पकड़े घंटों टहला करती..
उनके पार भी है कोई दुनिया .. वे दोनों नहीं समझती ...

वो अकसर एक दूसरे की बात बिन बताये जान जाती है..
जब भी हँसता है एक फीकी सी हँसी .. दूसरी उसकी आँखों की उदासी पहचान जाती है...

वैसे मिली है अभी कुछ ही अरसे से..
पर हो जैसे बिछड़ी बहने.. पिछले जन्म से..

एक मे दूसरी चीनी की तरह घुल जाती..
दूसरी पहली को अकसर अपने नाम से बुलाती..

पगली सी इठलाती .. बात बात पर खिलखिलाती
हो जैसे वो सोलह बरस की .. ऐसी ख़ुशबू उनसे आती...

अपनी ये दुनिया.. और सौ काम.. और हमेशा वक़्त की कमी रहती है..
वो


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फिर आज चींटी को अहसास दिलाया गया..
कि वो कितनी छोटी है....
फिर आज हथनी को बताया गया.. कि वो कितनी मोटी है..
फिर आज किसी कोयल को कहा गया..गाना वाना तो ठीक है..
पर सावन है.. तो पूरे पंख फैला कर..,
मोर की तरह डान्स करो ना...
ये क़ौम सब तरफ़ फैली है...  कही भी मिल सकती है...
इन से बच के निकलो..  फिर यही टकरा जाती है...
जीना इन्हीं के साथ है.. और मरने के बाद ये ही कहेंगे ..  कि साला ना ठीक से मरा.. और बेकार सा जीया...
इनके पास सब औज़ार है.. स्कूग्रेज.. वर्नियर कैलिपर्स..  वेंइग मशीन... थर्मामीटर.. वग़ैरा वग़ैरा ...
ये आप को नाप के तौल के बता देंगे ..
कि आप छोटे रह गये ..
और आपने जो भी किया.. वो इत्ता सा छोटा रह गया...
जब आप थक जायेंगे .. तो ये कहेंगे अरे चलो चलो तेज़ चलो..
और जब आप तेज़ चल रहे होगे.. तो ये कहेंगे .. थोड़ा आराम से..,
हाँ .. ये जीत जाते है...
आख़िर ये विजेता ठहरे....
अकसर ये इतना जीत जाते है..  कि आप इनके जैसा सोचने लगते हो..
कन्फूज से हो जाते हो.. चलू कि दौड़ूँ ..
या फिर साला खेलना ही छोड़ दूँ .
ये जीते भले ही हो.. पर आप हारते नहीं हो.. अगर आप सोचते हो..
क्या फ़र्क़ पडता है..
फिर सब ठीक है..

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मन्झिया डालो.. बोतला खोलो..  पिन्ड से कुछ पुराने यार आये है..
छप्पीया पाओ .. गिद्दा गाओ..
अरे कुछ साग वाग पकाओ..  लस्सी वस्सी बनाओ..
मुर्ग़ा वुर्गा बनाओ...  गोश्त मंगवाओ ..
पुराने वाले यार आये है..
पुरानी ग़ज़ले लगाओ...  पहली माशूक़ की याद दिलाओ..
किसकी गली मे कितने चक्कर लगाते थे.. किसके चक्कर मे आपस मे ही भिड़ गये थे..
वही क़िस्से फिर से दोहराओ..
अपने मे ही क्या बड़बड़ा रहे हो..  किससे बात किये जा रहे हो..
सुनो कह रहे थे..  कुछ लोग आने वाले है...
सुनो बाहर मॉल मे ही बुला लेते है यही खिला विला देते है...
बोलो क्या बोलते हो...  बताओ जल्दी क्या सोचते हो..,
हाँ ठीक है.. जैसा तुम ठीक समझो...
मेरा तो वैसे भी कल आफिस है...बस यही प्लान फ़ाइनल कर दो...


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Knock knock...
खोला ही नहीं तुमने...
लो फिर लौट गयी कोई उम्मीद की किरन...
प्यार से तैयार हो कर आयी थी..
पहनी थी ठेर सी चूड़ियाँ .. छनछनायी थी..
बड़ी गोल सी बिन्दी लगायी थी..
कौन सा दुपट्टा ओढ़ूँ .. आईने के सामने देर लगायी थी...
काजल भर भर कर लगाया था.. दोनों आँखों मे..
ना दरवाज़ा खुलने पे बाहर तक छलक आया था..
बहुत मायूस होकर धीरे धीरे लौटी थी..
क्या पता खुल जाये... दो बार मुड़ कर देखी थी....
अब कह नहीं सकते ..कब आयेगी..
वैसे बुलाते तो उसको सौ लोग है..
पर ये उसकी मुहोब्बत थी..जो तेरे दरवाज़े ख़ुद चल कर आयी थी..


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यार लाइफ़ मे कोई ऐसा ज़रूर होना चाहिये..
जिसको जब चाहे बुला कर एक कप चाय पी ली जाये..
कुछ दिल की वो सुना ले.. कुछ दिल की तुम बता लो..
चाय के कप ख़ाली होते तक..
थोड़ा दिल उसका हल्का हो जाय .. थोड़ा तुम्हारा हो जाय..
बस दस मिनट के लिये मिलते है.. कहकर
थोड़ा वो ठहर जाये.. थोड़ा तुम पसर जाओ...
बात थोड़ी लम्बी खिच जाये.. तो कभी दोबारा चाय चढ़ जाये..
कभी उसका हाल सुनते सुनते.. तुम्हारी आँख भर आये..
और वो फिर तुम्हें ही हँसाने लग जाये..
बस कोई ऐसा है अगर एक तुम्हारे पास ...और तुम्हारे घर मे दो कप है..
तो यक़ीं मानो तुम बहुत अमीर हो....
और बहुत सुखी हो...
और सब ठीक है...
             झन्कार..❤

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किसी हैपनिगं सी पार्टी मे बिलकुल मन ना लगना...
अपने किसी बोर से दोस्त की याद आना...
अच्छे टेस्टी स्टाटर देख कर खिचड़ी खाने का मन कर जाना...
सबको इन्जॉय करते देख कर..
ख़ुद मे ही कुछ कमी है क्या का एहसास होना...
कोई कोना ढूँढ कर.. फ़ोन पे कविता लिखने बैढ जाना..
अपने घर का झूला याद आना..
चुपचाप बाहर निकल कर अॉटो पकड़ कर भाग जाने मन होना...
ये शरीर मे कोई कैमिकल की कमी है..
या मैं बस अलग हूँ .. दिखाने का तरीक़ा है..
क्या ये सब लूज़र पना है..
या कोई रचना जन्म लेने की तैयारी कर रही है....

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सुन नयी सहेली..
हो सकता है.. कि हमारी दोस्ती दो दिन से ज़्यादा ना चल पाय..
टिक ही ना पाये.. इन दिल जले कमबख्तो की नज़रों के आगे..
पर फ़र्क़ क्या पड़ता है..
इन दो दिनों में चल आसमान छू आये..
लिख दे मोटा मोटा उस पे..
अपना तुम्हारा नाम..
और बना दे हार्टस ठेर सारे..
इतने कि छुप जाये तारे..
रसगुल्ले.. दही बड़े खाये..
कोई आ जाये.. तो प्लेट नीचे छुपाये..
कि कही वो चट ना कर जाये ..
और दो दिन में जी ले ऐसा रिश्ता..
कि सालों तक सबको सुनाये...

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वो एक ख़त जो तूने कभी मुझे लिखा ही नहीं...
मैं रोज़ बैठ कर उसका जवाब लिखता हूँ.........


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लड़के कितने अजीब होते है..
चश्मा पहन के चश्मा ढुढते है..  
मोबाइल पे बात करते करते मोबाइल ढुढते है..
और तमाम चीज़ें .. उन्हें अकसर सामने पड़ी चीज़ें नही दिखती..
कितने अजीब होते है..
रोज़  गीली तौलिया बिस्तर पे छोड़ के निकल जाते है..
और ख़ुद को एकदम परफ़ेक्ट दिखाते है..
ड्राईवर पे रौब जमाते है.. उसको पता है.. फिर भी रास्ते बताते है..
और पिक्चर देखते हुये चश्मे के अन्दर अपने आँसू छिपाते है..
बेटियाँ जो माँगे .. चिड़चिड़ाते है.. इसकी कोई ज़रूरत नही.. सब फ़िज़ूल खर्ची है बताते है..
फिर ख़ुद ही भाग के दौड़ के लाते है..
बेटों से अकसर भिड़ जाते है.. फिर बीवियों का सहारा ले कर उसे मनाते है..
बीवी का सबके सामने मज़ाक़ बनाते है.. अकेले मे बिछ बिछ जाते है..
और क्या क्या लिखू.. लड़के सच मे बड़े अजीब होते है...
बच्चों के लिये.. माँ बाप के लिये.. बीवी के लिये.. पूरे घर के लिये करते थकते है.. 
.. फिर भी पता नही क्यो ..मै इन सब के लिये कुछ भी नही कर पाया.. के बोझ दबे से रहते है..
सच मे लड़के अजीब होते है..
..बीवीके कमाये पाँच हज़ार .. इन्हें पाँच लाख लगते है.. अपने कमाये पाँच लाख.. पाँच सौ दिखते है..
हाँ लड़के बड़े अजीब होते है..

This poem is in response to the following poem by Gulzar..



लोग सच कहते हैं -
औरतें बेहद अजीब होतीं है

रात भर पूरा सोती नहीं
थोड़ा थोड़ा जागती रहतीं है
नींद की स्याही में
उंगलियां डुबो कर
दिन की बही लिखतीं
टटोलती रहतीं है
दरवाजों की कुंडियाॅ
बच्चों की चादर
पति का मन..
और जब जागती हैं सुबह
तो पूरा नहीं जागती
नींद में ही भागतीं है

सच है, औरतें बेहद अजीब होतीं हैं

हवा की तरह घूमतीं, कभी घर में, कभी बाहर...
टिफिन में रोज़ नयी रखतीं कविताएँ
गमलों में रोज बो देती आशाऐं

पुराने अजीब से गाने गुनगुनातीं
और चल देतीं फिर
एक नये दिन के मुकाबिल
पहन कर फिर वही सीमायें
खुद से दूर हो कर भी
सब के करीब होतीं हैं

औरतें सच में, बेहद अजीब होतीं हैं

कभी कोई ख्वाब पूरा नहीं देखतीं
बीच में ही छोड़ कर देखने लगतीं हैं
चुल्हे पे चढ़ा दूध...

कभी कोई काम पूरा नहीं करतीं
बीच में ही छोड़ कर ढूँढने लगतीं हैं
बच्चों के मोजे, पेन्सिल, किताब
बचपन में खोई गुडिया,
जवानी में खोए पलाश,

मायके में छूट गयी स्टापू की गोटी,
छिपन-छिपाई के ठिकाने
वो छोटी बहन छिप के कहीं रोती...

सहेलियों से लिए-दिये..
या चुकाए गए हिसाब
बच्चों के मोजे, पेन्सिल किताब

खोलती बंद करती खिड़कियाँ
क्या कर रही हो?
सो गयी क्या ?
खाती रहती झिङकियाँ

न शौक से जीती है ,
न ठीक से मरती है
सच है, औरतें बेहद अजीब होतीं हैं ।

कितनी बार देखी है...
मेकअप लगाये,
चेहरे के नील छिपाए
वो कांस्टेबल लडकी,
वो ब्यूटीशियन,
वो भाभी, वो दीदी...

चप्पल के टूटे स्ट्रैप को
साड़ी के फाल से छिपाती
वो अनुशासन प्रिय टीचर
और कभी दिख ही जाती है
कॉरीडोर में, जल्दी जल्दी चलती,
नाखूनों से सूखा आटा झाडते,

सुबह जल्दी में नहाई
अस्पताल मे आई वो लेडी डॉक्टर
दिन अक्सर गुजरता है शहादत में
रात फिर से सलीब होती है...

सच है, औरतें बेहद अजीब होतीं हैं

सूखे मौसम में बारिशों को
याद कर के रोतीं हैं
उम्र भर हथेलियों में
तितलियां संजोतीं हैं

और जब एक दिन
बूंदें सचमुच बरस जातीं हैं
हवाएँ सचमुच गुनगुनाती हैं
फिजाएं सचमुच खिलखिलातीं हैं

तो ये सूखे कपड़ों, अचार, पापड़
बच्चों और सारी दुनिया को
भीगने से बचाने को दौड़ जातीं हैं...

सच है, औरतें बेहद अजीब होतीं हैं ।

खुशी के एक आश्वासन पर
पूरा पूरा जीवन काट देतीं है
अनगिनत खाईयों को
अनगिनत पुलो से पाट देतीं है.

सच है, औरतें बेहद अजीब होतीं हैं ।

ऐसा कोई करता है क्या?
रस्मों के पहाड़ों, जंगलों में
नदी की तरह बहती...
कोंपल की तरह फूटती...

जिन्दगी की आँख से
दिन रात इस तरह
और कोई झरता है क्या?
ऐसा कोई करता है क्या?

सच मे, औरतें बेहद अजीब होतीं हैं..

गुलज़ार


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ज़िन्दगी कुछ सुबह की पहली चाय जैसी हो..
एकदम अपनी.. पर फिर भी हर घूँट के साथ नयी लगे..
सुकून दे .. आराम दे.. कोई जल्दी नही.. विश्राम दे..
थोड़ी और पी जाये.. कि चाह दे..
कुछ आलस दूर कर दे.. कुछ ख़ुमारी रहने दे..
फिर एक झपकी मार ली जाय.. कि इजाज़त दे..  
पूरा दिन आगे पड़ा है.. की ताक़त दे..
.....  ..ज़िन्दगी कुछ सुबह की पहली चाय सी हो...


अपनी.. अपनी वाली..

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फिर वही खड़े हम...
ज़िन्दगी ऐसी जैसी .. ट्रेडमिल पे चढ़े हम...
दौड़े भागे चले .. थक के चूर हुये हम..
पर .. फिर वही खड़े हम..
चिता के जलने सा महोत्सव.. लपटो  सा उदगार..
खाक हुए.. राख हुए..  
फिर भी .. वही डटे हम..
फिर वही खड़े हम..
क्या सुख ..क्या दुख..
क्या सुखों का दुख.. क्या दुखो का सुख..
सबमे हम लुटे हम..
फिर वही खड़े हम...
सीधे रास्तों पे घूमे हम.. मन्जिलो पे भटके हम.. घने छॉहो वाले पेड़ों पे लटके हम.. 
ख़ुद की फ़ितरत से डरे हम..
फिर वही खड़े हम..
तारीफ़ों से शर्मिंदा हुए हम..  गालियों से तने हम..
सब भाड मे झोंक कर देर तक सोये हम.. थक के सोकर उठे हम..
फिर वही खड़े हम...


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ग्लास मे ना पानी है..

थाली मे ना खाना है..
4G का ज़माना है..
जो पढ़ गये .. सो बाहर गये.. या किसी उँची कुर्सी चढ़ गये..
कहाँ है वो.. जो औरों के लिये सूली चढ़ गये..

अब तो भइया गूंगो का देश है.. अन्धों को जिताना है..


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फिर कुछ नही किया...
  सुबह से शाम.. कुछ नही..
कभी झूले पे बैढ..  कभी बिस्तर पे लेट..
कुछ नही किया..
कभी बालकनी मे दूर तक देखते हुए..
कभी बेवजह फ़ोन अलटते पलटते हुये..
कभी कॉपी पेन लेकर .. कभी लेपटॉप खोलकर..
कुछ न करने का रिआज..
कई सालों ले लगातार..
ये एक अहसास..
कि कुछ किया ही नही..

कुछ करती ही नही...

(bahut sundar hain,

Hmmm...  ख़रीदोगी? .. 
kitne ki hai?)

क्या बस यूँही .. कभी मेरी कवितायें ख़रीदोगी तुम...

अपनी अलमारीयो मे सज़ा लेना..
या कभी किसी ख़त को उनसे सजा देना..
कभी किसी रात .चाँद को सुना देना..
या कभी अकेले मे..यूँही गुनगुना लेना..
कभी ओढ़ लेना उन्हें.. कभी आसमान पे बिछा देना.. 
कभी अपने तकीये के नीचे अपने सपनों से मिलवा देना..
उन्हें गोद ले लो.. अपना बना लो.. 

अपनी किसी डायरी मे .. अपने किसी पेन से .. अपना नाम दे दो…



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सडक का नाम महात्मा गांधी हो या भगत सिहं..
सड़के तो साफ़ चौड़ी चिकनी होनी चाहिये..
बाग़ का नाम शारजाह हो या हनुमान..
बच्चों के लिये खेल के मैदान होने चाहिये..
नाम मे आगे बच्चन लगे या खान ..
दिल तौले तो इन्सान होना चाहिये..
मसले जो है ज़रूरी ..
पीने को हर के पास पानी..
और पास मे रोटी कपड़ा मकान होना चाहिये..
करने दो उनको.. जिनका काम है सियासत...
हम सबके पास तो..

करने को थोड़ा काम.. उसका उचित दाम..  परिवार..बच्चे..सुकून की नीदं चैनों आराम होना चाहिये..

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घोड़ा बनो.. घोड़ा बनाओ...घोड़ा बनो.. घोड़ा बनाओ...
हाथी को थोड़ा पतला करो.. 
कान थोड़े छोटे करो..  
सूँड़ वूँड हटाओ.. उसे  घोड़ा बनाओ..
घोड़ा बनो.. घोड़ा बनाओ...घोड़ा बनो.. घोड़ा बनाओ.
खच्चर को कोसो .. 
ख़ूब सुनाओ उसे.. 
भीगे चने खिलाओ..  उसे घोड़ा बनाओ..
नही नही तोता मैना बिल्ली कुत्ता कुछ नही..
घोड़ा बनो.. घोड़ा बनाओ..
घोड़ा दौड़ता है.. रेस जीतता है..  रेस दौड़नी चाहिये .. रेस जितनी चाहिये..
..
.... बस दौड़ते जाओ.. दौड़ते जाओ..दौड़ते जाओ..
नही नही थको नही. .. बोर्नव्टा पियो.. बदाम खाओ....   दौड़ते जाओ..   कही नही पहुँचे ... पता नही कि कहाँ पहुँचना है..  बस दौड़ते जाओ..  गोल गोल... दौड़ते जाओ..
घोड़ा बनो.. घोड़ा बनाओ..
घोड़े को चाबुक मारो.. वो और तेज़ दौड़ेगा ..
और चाबुक मारो.. और चाबुक मारो....  और दौडाओ.. और दौडाओ..
पीठ दर्द हो रही है.. मूव मलो..  
दौड़ते जाओ...
जोड़ो मे दर्द है.. घी खाओ.. दौड़ते जाओ..
घोड़ा बनो घोड़ा बनाओ..,
उसके stamina को और बढ़ाओ ..
दौड़ते जाओ.. दौड़ाते जाओ..
ख़ुद को चाबुक मारने वालों को समर्पित..

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पकते खाने की खुशबु.. किसी भी हसीनतर इत्र से ज़्यादा हसीन होती है ..
ये राई करी पत्ते की छौंक ..  ये देसी घी का गर्म होना.. ये जीरे का तडकना..
ये मसालों का भुन जाना..  ये दालचीनी .. ये तेजपत्ते का पुलाव मे पड़ना ..
ये ताज़ी सिकती रोटी की महक.. घर के कोनो मे फैल जाना..
दूर किनारे किसी बुज़ुर्ग की आवाज़ ..

सुनो चावल पक गये है..
क्या खीर चढ़ी है..
ये ख़ुशबुएँ जो घर को घर बनाती है..
एक छोटे से कमरे को रसोई कहलवाती है..
आबाद रहे!!!
चूल्हे कितने भी अलग हो..
हर घर मे ये ख़ुशबुएँ रहे.. 
हर घर मे ये ख़ुशबुएँ महके 

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कभी ख़ुद को याद दिलाना पड़ता है.. कभी दुसरो से कहलवाना पड़ता है..
कि सुनो तुम ज़िन्दा हो..  देखो ना साँस तो ले रहे हो..
कभी एक खिड़की खुली छोड़नी पड़ती है..
कभी कोई खुला रोशनदान दिखा देता है..
कभी कोई चिड़िया .. कभी कोई फूल..
कभी डायरी पे जमी धूल..

बताती है.. मुझे देखो.. मुझे सुनो..
आईना कहता है.. आज तो तुम बहुत सुन्दर मुस्कुरा रही हो..
बस सब ठीक है...  हाँ तुम ज़िन्दा हो..
हाँ तुम ज़िन्दा हो..  वरना ज़हन मे ये सवाल ही ना आता.. 
हाँ सब ठीक है…

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१...
सब कुछ है बराबर..
सूरज सही जगह से निकला है
चाँद सही वक़्त पे डूबा था..
बाई आई है.. खाना बना है ..
पर एक फाँस सी गड़ी है.. दिल के किसी कोने मे...
कि कही कोई रूठा खड़ा है...
२.
 रूठा है कोई..
मनाना चाहिये....
मचला है कोई बच्चा..
चाँद को ज़मीन पे बुलाना चाहिये..
३. 
कैसे कहु मै उसको अपना दोस्त..
कैसे कहु मै उसको अपना दोस्त..
हँसा तो बहुत है.. वो मेरे साथ..
पर कभी फूट के रोया नही मेरे पास...


४.
क़त्ल कर के आये हो..
कोई बात नही...
क़त्ल कर के आये हो नहीकोई बात ...
ख़ुद को मार रहे हो..  
अब कुछ नही हो सकता तुम्हारे साथ..

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क्या तुम ज़िन्दा हो..
वही घर .. वही बिस्तर.. वही जान छिड़कते दोस्त . वही तुम्हारी चाय..
क्या सच मे तुम ज़िन्दा हो..
वही कपड़ों की अलमारी.. वही साड़ियाँ ठेर सारी...
वही रास्ता तुम्हारे घर का.. वही ज़िम्मेदारियाँ तुम्हारी..  
सोचो ना क्या तुम ज़िन्दा हो..
वही कमाना.. उसमें थोड़ा बचा लेना..
दीवाली होली पे घर सज़ा लेना
ख़ुशियों मे हँस लेना.. ग़मों मे रो लेना..

बर्डे पर केक काट लेना.. और कुछ ना हो तो टीवी लगा लेना..
चेक करो कि तुम ज़िन्दा हो..
जाओ वहाँ ,जिनको नही जानते..
ना काम है जिनसे ..
कुछ करो ऐसा कि मुँह से निकले कि ये मै नही कर सकता.
कभी अपने पे हँसवाओ.. ख़ुद को पागल कहलवाओ..
रहना है ज़िन्दा तो रोज़ किसी छोटे बच्चे से बतिआओ..
ख़ुद को ज़िन्दगी से मिलवाओ ..

५.
कैसे बताऊँ .. हमने क्या किया..
इतना ज़्यादा मनाया उसे..

कि वो और रूठ गया..

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ऐ दोस्त ऐसे तो ना जाओ..
कई गालीयाँ बाक़ी है देने को..
कुछ लाते .. कुछ बातें बची है कहने को..
कैसे जा सकते हो..
कुछ बेसुरे गाने.. कुछ लम्बी कवितायें सर के उपर से गुजरनी बाक़ी है.. 
कुछ लड़ना कुछ झगड़ना .. कुछ फ़ालतू मे अकड़ना बाक़ी है..
बाक़ी बहुत कुछ है..   
अभी फ़िल्म मे इन्टरवल के बाद twist और बहुत है
...  ..,
है ज़िन्दगी गर रिश्ता ..
और गर रिश्तों मे है सलवटे..
तो चलो एक अच्छी प्रेस ख़रीदते है..
पर प्रेस करते करते रिश्ते जलने नही चाहिये..

इससे तो बेहतर है.. रिश्तों मे कुछ सलवटे..